Bharat-Nepal: भारत-नेपाल के रिश्तों में दरार, चीन के शह पर भारत को दिखा रहा है आँख

भारत-नेपाल में अच्छा और दोस्ताना व्यवहार हमेशा से चला आ रहा है। उसकी तमाम जरूरतें भारत ही पूरा करता रहा है। काठमांडू हवाई अड्डे का निर्माण हो या भूकंप में मदद, भारत ने आगे बढ़कर सहायता की। व्यापार, शिक्षा, इलाज से लेकर सांस्कृतिक-आध्यात्मिक रूप से दोनों देश एक-दूसरे के बेहद करीब रहे हैं।

Bharat-Nepalभारत-नेपाल के रिस्तो मे दरार, चीन के शह पर भारत को दिखा रहा है आँख

तो फिर आज यह सवाल उठता है की, आज ऐसी कौन की परिस्थिति पैदा हो गईं, जिससे नेपाल की मौजूदा ओली सरकार इतिहास दरकिनार कर भारतीय क्षेत्रों को अपना बता रही है।


भारत-नेपाल के सीमा विवाद के मूल में नेपाल युद्ध के बाद 4 मार्च 1816 को हुई सिगौली की संधि है। यह संधि बराबरी पर आधारित नहीं थी। कंपनी शासन ने अपने निर्णय नेपाल पर थोपे थे। गोरखा साम्राज्य का लगभग एक तिहाई ले लिया गया था।


संधि की धारा 5 के अनुसार, काली से पश्चिम के किसी भूभाग पर नेपाल का अधिकार समाप्त हो गया। काली भारत और नेपाल की सीमा मानी गई, बिना यह जाने कि उस क्षेत्र का वास्तविक भूगोल क्या है? बाद में कालापानी से बरमदेव (टनकपुर) तक काली नदी भारत-नेपाल सीमा बन गई।


नेपाल-भारत की सीमा 1776 किमी. लंबी है। नेपाल के साथ भारत के 26 जिले सीमा बनाते हैं। 54 स्थानों पर भारत-नेपाल सीमा पर विवाद है, जिनमें से एक कालापानी-लिपुलेख है। नेपाल-भारत की खुली सीमा है, बंद या नियंत्रित नहीं।

सूत्रो के द्वारा खीची हुई फोटो

चीन के शह पर भारत को दिखा रहा है आँख


नेपाल ने भारत-नेपाल बॉर्डर की 1880 खुली सीमा पर चीन द्वारा दिये गये चीनी भाषा लिखे टेन्ट मे अपने APF जवानो को तैनात कर दिया है। नेपाल ने नेपाल बॉर्डर पर 516 APF पोस्ट की स्थापना की है। इससे साफ पता चलता है की नेपाल चीन के शह पर भारत को आँख दिखा रहा हैभारत-नेपाल के बीच चीन अपने स्वार्थ के लिए कूटनीति चाल चल रहा है। इस पर नेपाल को गंभीरता से सोचना चाहिए और समझना चाहिए की चीन मोहरा बनाकर भारत-नेपाल के रोटी-बेटी के सम्बंध में चीन दरार डाल रहा है जो नेपाल को बारीकी से समझना होगा। नेपाल भारत का रिश्ता सरकारों से नही जनता से जनता की है


1856 में तिब्बत और नेपाल के बीच हुई संधि में नेपाल के जनता को तिब्बत में व्यापार तथा चराई के अधिकार मिले। चीन में साम्यवादी सरकार के आने के बाद दृश्य बदला। नेपाल-चीन सीमा 1415 किमी. है, जो 15 सीमांत जिलों से लगी है।


जहां पशु चराने वाले बौद्ध समुदाय के लोग रहते हैं। यहीं वे दर्रे हैं जो व्यापार, तीर्थयात्रा तथा पशुचारण के लिए खुलते हैं। चीन ने सागरमाथा (ऐवरेस्ट) शिखर को अपना कहा था। फिर चतुराई दिखाई। 1960 में चीनी प्रधानमंत्री ने सागरमाथा को नेपाल का माना।


नेपाल-चीन सीमा समिति ने जल्दी सीमा का हल कर लिया। संधि के अनुसार, अरुण घाटी के कुछ क्षेत्र नेपाल को लौटा दिए। लेकिन नेपाल की सीमा जो तिब्बत की तरफ थी उसे चीन ने जलविभाजक धार तक ला दिया। इस तरह चीन ने एक तीर से दो शिकार करने में कामयाबी पाई।


भारत सुस्त रहा और टालता रहा। राजदूतों ने अस्पष्ट वक्तव्य दिये। सीमा विवाद संबंधी भारत नेपाल संयुक्त समिति को अधिक गंभीरता से और जल्दी इसका निदान ढूढ़ना चाहिए। वह सदियों से भारत का अभिन्न मित्र है और कई मामलों में भारत पर निर्भर है।

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