क्या आजाद पाकिस्तान चीन का गुलाम होने जा रहा है? इमरान खान ने जो कहा, उसे जरूर पढ़ें

आज यह रिपोर्ट लिखते वक्त पाकिस्तान पर एक शब्द बिलकुल सही जमता है 'बेचारा पाकिस्तान'। जी हाँ आज यह रिपोर्ट पढ़ कर आपको समझ आएगा की आतंकपरस्त और दुसरो के टुकड़ो पर पलने वाला पाकिस्तान आज ऐसी हालत में है जहा पर पाकिस्तान का मुखिया इमरान खान खुद कह रहे है की पाकिस्तान का भविष्य अब चीन के ही साथ है।

क्या आजाद Pakistan चीन का गुलाम होने वाला है? जरूर पढ़िए इमरान खान ने क्या कहा

एक समय था जब पाकिस्तान अमेरिका और सऊदी अरब का लाडला हुआ करता था। अब अमेरिका और सऊदी अरब दोनों भारत के करीब हैं। पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय संबंध में अमेरिका, चीन और सऊदी अरब धुरी की तरह रहे हैं। और इन्हीं तीनों देशों के इर्द-गिर्द पाकिस्तान की विदेश नीति आगे बढ़ती रही है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी भी देश से किसी की करीबी और दूरी स्थायी नहीं होती है। यह इस पर निर्भर करता है कि उस देश की दूसरे देश के लिए प्रासंगिकता कितनी बची है।


पाकिस्तान और अमेरिका के दोस्ती का इतिहास


पाकिस्तान शुरुआत से ही अमेरिका के खेमे में रहा है। शीतयुद्ध के दौरान जब दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व में दो ध्रुवीय थी, तब भी पाकिस्तान अमेरिका के साथ था। अमेरिका से उसकी दोस्ती पुरानी थी और भारत से अमेरिका की दूरी पुरानी। अब हालात बिल्कुल उलट गए हैं। अमेरिका के लिए भारत हर क्षेत्र में अब प्रमुख साझेदार बन गया है और पाकिस्तान अप्रासंगिक हो गया है।


क्यों अमेरिका पाकिस्तान को करोड़ो का फण्ड देता था?


अमेरिका के लिए अफगानिस्तान अहम मसला था और वहां से तालिबान को बेदखल करने में पाकिस्तान की भूमिका को अहम समझता था। लेकिन दशकों की लड़ाई में पाकिस्तान ने तालिबान के खिलाफ अमेरिका को कभी ईमानदारी साथ नहीं दिया और करोड़ों डॉलर का फंड इसके नाम पर लेता रहा। राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय से ही पाकिस्तान से अमेरिका के संबंधों में अविश्वास भरपूर आ चुका था और फिर डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद कुछ नहीं बचा।


पाकिस्तान का बड़बोलापन ही उसे ले डूबा


पाकिस्तान चाहता था कि भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किया तो सऊदी अरब इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी के बैनर तले भारत को घेरे लेकिन सऊदी ने ऐसा नहीं किया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी सऊदी से इतने खफा हो गए कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर सऊदी अरब कश्मीर पर मदद नहीं करेगा तो पाकिस्तान अपने स्तर पर इस्लामिक देशों से बात करेगा।


जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री ऐसा कह रहे थे तो उन्होंने उस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि सऊदी अरब में लाखों पाकिस्तानी अपनी आजीविका के लिए रह रहे हैं और पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में अहम योगदान कर रहे हैं। कुरैशी यह भी भूल गए कि पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किया था तो सऊदी ने माली हालत में मुफ्त में तेल मुहैया कराया। कुरैशी यह भी भूल गए कि इमरान खान के पीएम बनने के बाद पाकिस्तान डिफॉल्टर बनने की कगार पर था और तब सऊदी ने ही तीन अरब डॉलर की मदद मुहैया कराकर बचा लिया।


पाकिस्तान को अपने बड़बोलेपन का अंदाजा बाद में हुआ तो सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को आनन फानन में रियाद भेजा गया। लेकिन इससे पाकिस्तान को कोई फायदा मिलता नजर नहीं आ रहा है। अब पाकिस्तान के साथ अमेरिका के बाद सऊदी अरब ने भी अपने नाता तोड़ लिया है। इन दोनों देशों के बाद चीन की बारी आती है और जाहिर है कि चीन अब भी पाकिस्तान के साथ है।


सऊदी अरब के लिए भारत पाकिस्तान से ज्यादा महतवपूर्ण क्यों?


पाकिस्तान को लगता है कि दो देशों में समान धर्मों का होना दोस्ती की गारंटी है। लेकिन ऐसा नहीं है, दो देशों के द्विपक्षीय संबंधों में साझे हितों की अहम भूमिका होती है। पाकिस्तान से अब सऊदी अरब के हित नहीं जुड़े हैं, जबकि भारत से सऊदी अरब के हित बहुत हद तक जुड़े हैं। भारत तेल जरूरतों का 90 फीसदी हिस्सा आयात करता है और उसमें सऊदी अरब से सबसे ज्यादा खरीदता है। सऊदी अरब और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार 27 अरब डॉलर के हैं जबकि पाकिस्तान और सऊदी के बीच का कारोबार महज तीन अरब डॉलर का। भारत एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है जबकि पाकिस्तान अपना कर्ज चुकाने की भी स्थिति में नहीं है।


पाकिस्तान का भविष्य अब चीन के ही साथ है: इमरान खान


मंगलवार को चीन से जुड़े एक सवाल के जवाब में इमरान खान ने कहा, "हमें इस मामले स्पष्ट हो जाने की जरूरत है कि पाकिस्तान का भविष्य चीन के साथ है। चीन हमारा वैसा दोस्त है जो हर मुश्किल स्थिति में राजनीतिक रूप से खड़ा रहा है। चीन दुनिया भर में तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है और इसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। पाकिस्तान की तरक्की चीन के साथ जुड़ी हुई है। हमारी खुशकिस्मती है कि चीन ने हमारा हर जगह बचाव किया है। हमारे संबंध चीन के साथ और मजबूत हो रहे हैं और चीन को भी पाकिस्तान की जरूरत है।"


इमरान खान ने आगे कहा, "पाकिस्तान के पास रणनीतिक लोकेशन है और चीन को भी हमारी इस अहमियत का अंदाजा है। हमारी बदकिस्मती यह है कि हिन्दुस्तान को चीन के खिलाफ दूसरे देश इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए हम चीन को मजबूत करते रहेंगे। चीन हमारे लिए बहुत अहम होने जा रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस साल सर्दियों में पाकिस्तान आएंगे।’’


इमरान खान साफ कह रहे हैं कि अब पाकिस्तान चीन के हवाले है और जो कुछ भी करना है, उसे ही करना है। जाहिर है कि चीन का पाकिस्तान में दखल बढ़ना भारत के भी हित में नहीं है। पाकिस्तान की संप्रभुता चीन के हवाले होने के बाद उसकी सामरिक ठिकानों पर भी चीन का नियंत्रण बढ़ेगा और यह भारत के हक में नहीं होगा।


पाकिस्तान को उस सोच से बाहर निकलना होगा: हक्कानी


किसी मुल्क का भविष्य किसी एक देश के हवाले हो जाना कितना खतरनाक हो सकता है, यह शायद इमरान खान या पाकिस्तान को बाद में पता चले। अमेरिका पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने ट्वीट कर कहा है कि पाकिस्तान को उस सोच से बाहर निकलना होगा कि उसे सऊदी अरब और अमेरिका ने तबाह कर दिया। हक्कानी ने कहा कि पाकिस्तान सऊदी से आर्थिक मदद भी चाहता है और मनमानी भी। लेकिन इतना तो साफ है कि पाकिस्तान चीन को छोड़कर पूरी दुनिया के लिए बहुत प्रासंगिक नहीं रहा।


एक मोर्चे से नहीं बल्कि एक साथ कई मोर्चों से संभव है जंग


पाकिस्तान की संप्रभुता चीन के हवाले होने के बाद उसकी सामरिक ठिकानों पर भी चीन का नियंत्रण बढ़ेगा और यह भारत के हक में नहीं होगा। चीन और पाकिस्तान दोनों से भारत की जंग हो चुकी है। चीन ने भारत पर 1962 में हमला कर लद्दाख का बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया था। पाकिस्तान को भारत के साथ हर जंग में मुंह की खानी पड़ी है। अब कहा जाता है कि अगर चीन या पाकिस्तान किसी से भारत का टकराव बढ़ता है तो भारत को दोनों देशों का सामना करना पड़ेगा। भारत के पूर्व सेना प्रमुख और वर्तमान सीडीएस जनरल बिपिन रावत भी कह चुके हैं कि भारत की सेना एक साथ ढाई मोर्चे से जंग के लिए तैयार है। मतलब भारत को भी इस बात का अंदाजा है कि अब जंग किसी एक मोर्चे से नहीं बल्कि एक साथ कई मोर्चों से संभव है।


चीन ने सीपीईसी के तहत पाकिस्तान में 66 अरब डॉलर का निवेश किया है। ये सारा पैसा पाकिस्तान के लिए कर्ज के तौर पर है और चीन का कर्ज दुनिया भर में संदिग्ध माना जाता है। वो अपने कर्ज के दम पर कर्जदार देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है और फिर मजबूरी में उस देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता बुरी तरह से प्रभावित होती है। उदाहरण के तौर पर श्रीलंका कर्ज नहीं चुका पाया तो उसे चीन सो हम्बनटोटा पोर्ट 99 साल के लीज पर देना पड़ा। पाकिस्तान में भी चीन का दखल और बढ़ेगा तो उसकी जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए और हो सकता है।


एक संप्रभु देश अपना भविष्य खुद तय करता है लेकिन पाकिस्तानी पीएम कह रहे हैं कि चीन तय करेगा। इसी से पता चलता है कि आने वाले वक्त में चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ किस हद तक पहुंचने वाला है और यह भारत के हितो में बिलकुल नहीं होगा।

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