इंडिया-इंडिया की गर्जन और रिंग के चारो तरफ तिरंगा लहरा रहा था, एक मौका था लेकिन मुकमल नहीं कर पाया

उस दिन हम सभी लोग बहुत खुश थे क्यों की हमारा बॉक्सिंग कोच नहीं आ रहा था और आज के लिए हमारे बॉक्सिंग कोच है ये महानुभाव राजेंद्र सिंह श्रीवास्तव। ये हमारे पुरे कोचिंग सेंटर में सबसे उम्दा खिलाड़ी है, हाँ हाँ खिलाड़ी भी अच्छे है। इसके अलावा दूसरे सबसे उम्दा खिलाड़ी नूर मोहमद सैफ़ी, इनसे जरा दुरी बना कर ही रखना। ये खिलाड़ी जिस रिंग में होता है वहा पर अच्छे अच्छों की हवा टाइट हो जाती है।

इंडिया-इंडिया की गर्जन और रिंग के चारो तरफ तिरंगा लहरा रहा था, एक मौका था लेकिन मुकमल नहीं कर पाया

और हाँ मेरा नाम अभय सिंह, मैं भी हूँ लेकिन थोड़ा कम सीनियर। हमारी आज की कोचिंग शुरू हुई है और अच्छे से बिना पिटे खत्तम भी हो गयी। अगले दिन कोचिंग सेंटर में हमारे लिए एक सरप्राइज था जिसका हम तीनो को कोई अंदाजा नहीं था। हम पहुंचे और क्लास खत्तम होने के बाद मिला हमें सरप्राइज। हमारे कोच राज ठाकुर, वो उठे और बोले की अगले हफ्ते हमें अंतर्राष्ट्रीय बॉक्सिंग चैंपियनशिप खेलने जाना है। लेकिन उससे पहले सबको अपनी तैयारी, फिटनेस का टेस्ट देना होगा। इससे पहले जितने बार ठाकुर साहब ने यह बात बोली उतने बार हम तीनो ने बहुत मर खायी। लेकिन इस बार हम लोग तैयार थे बॉक्सिंग चैंपियनशिप के लिए।


अगले ही पल उन्होंने बताया की बॉक्सिंग चैंपियनशिप के लिए 1000 रुपया की फीस लगेगी। कैसे भी करके हमने इंतजाम किया और सेलेक्ट हो गए। हम गरीब परिवार से आते थे और हमारे बॉक्सिंग कोच हमें फ्री में ही ट्रेनिंग भी देते थे। अगले हफ्ते होने वाले चैंपियनशिप के लिए हमने पूरा जोर लगा दिया। रोज सुबह पुरे स्टेडियम का राउंड लगाना, घंटो बॉक्सिंग बैग पर प्रैक्टिस करना, टिप्स एंड ट्रिक्स सब कुछ हमने एक हफ्ते में पूरा किया।


हमारा चैंपियनशिप दिल्ली में ही होने वाला था, जब हम वहा पहुंचे तो हमें पता चल की श्रीलंका, नेपाल, साउथ अफ्रीका, इस्रइले जैसे देशो से खिलाड़ी आये है। लेकिन हमारे जिंदगी की सबसे हसीं पल वो था जब हमारे कोच ठाकुर साहब ने हमें इंडिया का टीशर्ट दिया, ऐसा लगा की जैसे भीड़ में एक पहचान मिल गया हो। हम तीनो उस टीशर्ट को पहन कर पूरा स्पोर्ट काम्प्लेक्स घुमा और खूब मजे किये। १ हफ्ते के चैंपियनशिप का आज पहला दिन था इसलिए ठाकुर साहब ने कुछ बोलै नहीं वैसे।


जब मैं घर पंहुचा तब अपनी जैकेट उतर कर पापा के हाथ में रखा और बोला "पापा- मम्मी आज मेरे को मेरी पहचान मिल गयी"। सब लोग बहुत खुश हुए और बहुत साडी बधाईया भी मिली। अगले दिन से हम तीनो का मैच शुरू होना था, इसलिए आज हम लोग आपस में मैच के बारे में बात कर के सो गए।


आज सबसे पहले राजेंद्र सिंह श्रीवास्तव का मैच है फिर नूर मोहम्मद का फिर मेरा। हम तीनो ने सीने पर तिरंगा और पीछे अपना नाम लिखे हुए टीशर्ट पहना हुआ था और धड़कन बहुत तेज दौरने लगी थी। सबसे पहला नाम बोला गया राजेंद्र का और राजेंद्र का फाइट था नेपाल के साथ। कड़े मुकाबले में उन्होंने वो मैच जीत लिया साथ ही नूर ने भी अपना मैच जीत लिया श्रीलंका के खिलाफ। अब मेरे ऊपर प्रेशर बहुत बढ़ गया की अगर मैं नहीं जीत पाया तो एक मौका है जो की हाथ से छूट जायेगा और फिर ये गर्जन कभी नसीब नहीं होगा। यही सोच कर मैं रिंग में गया और मैंने भी अपना पहला फाइट जीत गया।


राजेंद्र और नूर ने स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया और आज मेरी बारी है। लेकिन मैं खेलने के हालत में नहीं था, पिछले दिनों मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हुआ था जिसके बाद मुझे पता चला की मेरे दाई तरफ साउथ अफ्रीका के मैच के दौरान लगी किक के वजह से सूजन आ गयी है जिसके वजह से मैं आगे नहीं खेल सकता हूँ। लेकिन मैंने यह बात किसी को नहीं बताई और अपने अगले मैच के तैयारी में लग गया।


मैं रिंग में उतर तो गया था लेकिन मेरे को पता कुछ नहीं था की आज क्या होने वाला है। पता था तो बस इतना की आज सोना अपने घर लेकर जाना है और भारत का नाम ऊंचा करना है। पहला राउंड शुरू हुआ और जिसका दर था वही हुआ, दर्द के कारन मैं अटैक नहीं कर पाया और पहला राउंड हार गया। अगले राउंड में थोड़ा दम दिखाया और एक कड़ी टकर दी और जीता लेकिन एक पंच लगने के बाद दर्द और तेज हो गया ।


ठाकुर साहब को यह बात पता चल गयी। उन्होंने मेरे से पूछा फिर मैंने भी पूरी बात बताया, उन्होंने बोला नाम वापस ले लेते है सिल्वर मैडल फिर भी मिलेगा। चारो तरफ इंडिया-इंडिया के नारे के गर्जन से पूरा स्पोर्ट काम्प्लेक्स में जैसे भूकंप सा आ गया था और चारो तरफ तिरंगा अपने चरम पर लहरा रहा था। यह सब देख कर मैंने ठान लिया की अब जो भी होगा वो देखा जायेगा लेकिन आज मैं हार नहीं मानूंगा। मेरी अपनी जिद थी की मैं अपने पहले अंतर्राष्टीर्य मैच में सोना ही लेकर जाऊंगा।


अगले राउंड में सामने वाला खिलाड़ी मेरे पर हावी हो गया और एक कड़ी टक्कर में भारत की जीत हुई। मैं अपने घर उस दिन सोना तो लेकर आ गया लेकिन अफ़सोस मैं वापस कभी रिंग में न जा सका। मैंने उस दिन एक गोल्ड मैडल की कीमत अपने पुरे बॉक्सिंग भविष्य के रूप में चुकाई।


Disclaimer: यह एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी है। लेकिन सभी किरदारों का नाम काल्पनिक है।

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